हनुमान चालीसा करने के लाभ । हनुमान चालीसा का अर्थ, महत्व और सम्पूर्ण पाठ



हम हनुमान चालीसा कर पाठ भक्ति भाव से करते हैं, लेकिन अधिकांश लोगों को हनुमान चालीसा का हिन्दी में अर्थ नहीं पता होता है,इसी बात को ध्यान में रखकर यहाँ हनुमान चालीसा का सम्पूर्ण पाठ का अर्थ इस आर्टिकल में लिखा है, आप ध्यान से एक बार अवश्य पढ़े।

आइये जानें कि इस लेख में हम क्या पढ़ेंगे :

  • हनुमान चालीसा का सम्पूर्ण पाठ ( अर्थ सहित )
  • हनुमान चालीसा का महत्व 
  • हनुमान चालीसा का पाठ करने के लाभ 
  • हनुमान चालीसा पढ़ने के नियम 
  • जानें हनुमान चालीसा मंगलवार और शनिवार को ही क्यों 
  • हनुमान चालीसा करने का उद्देश्य 

हनुमान चालीसा का संपूर्ण पाठ

अर्थ सहित दिया गया है। आप इसे आसानी से पढ़ और समझ सकते हैं।

श्री हनुमान चालीसा

दोहा

 श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
 बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

(अर्थ: श्री गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्री रघुवीर (श्रीराम)
 के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाला है।)

 बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन-कुमार।
 बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
 
(अर्थ: हे पवनकुमार! स्वयं को बुद्धिहीन जानकर मैं आपका स्मरण करता हूँ। आप मुझे बल, बुद्धि 
और विद्या प्रदान करें और मेरे सभी कष्टों व दोषों को दूर करें।)

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
(हे ज्ञान और गुण के सागर श्री हनुमान जी, आपकी जय हो! तीनों लोकों में वानरराज के रूप में आपकी कीर्ति फैली हुई है।)

रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत

 नामा॥२॥

(आप भगवान श्रीराम के दूत और असीम बल के धाम हैं। आप माता अंजनी के पुत्र और पवनसुत के नाम 
से जाने जाते हैं।)

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

(आप महान वीर और वज्र के समान अंगों वाले हैं। आप कुबुद्धि को दूर करने वाले और 
सुबुद्धि (अच्छे विचारों) के साथी हैं।)

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥

(आपका रंग सोने के समान चमकीला है और आप सुंदर वस्त्रों में सुशोभित हैं। आपके कानों
 में कुंडल और बाल घुंघराले हैं।)

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥५॥

(आपके हाथों में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं, और आपके कंधे पर मूंज का जनेऊ शोभा दे रहा है।)

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥६॥

(आप शिव के अवतार और राजा केसरी के पुत्र हैं। आपके तेज और पराक्रम की सारा संसार वंदना करता है।)

बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥७॥

(आप अत्यंत विद्वान, गुणी और चतुर हैं। आप भगवान श्रीराम के कार्यों को करने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं।)

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥८॥

(आप प्रभु श्रीराम की कथा सुनने के रसिक हैं। श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता हमेशा आपके हृदय में वास करते हैं।)

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥

(आपने अत्यंत छोटा रूप धारण करके माता सीता को दिखाया और विशाल व भयानक रूप धारण करके लंका को जलाया।)

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥

(आपने विशाल रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और श्रीराम के सभी कार्यों को सिद्ध किया।)

लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥११॥

(आप संजीवनी बूटी लेकर आए जिससे लक्ष्मण जी के प्राण बचे। इससे अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको
 गले से लगा लिया।)

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥

(श्री रघुनाथ जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भरत के समान ही प्रिय भाई हो।)

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥१३॥

(हजारों मुख वाले शेषनाग भी आपका यश गाते हैं—ऐसा कहकर लक्ष्मीपति श्रीराम ने आपको फिर से 
गले से लगा लिया।)

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥

(सनक, सनातन आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, नारद मुनि, माता सरस्वती और शेषनाग भी आपका 
गुणगान करते हैं।)

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥१५॥

(यमराज, कुबेर और दसों दिशाओं के रक्षक (दिग्पाल) तथा बड़े-बड़े कवि और विद्वान भी आपकी 
कीर्ति का पूरी तरह वर्णन नहीं कर सकते।)

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥

(आपने सुग्रीव पर महान उपकार किया, उन्हें श्रीराम से मिलाया जिससे उन्हें वानरराज का पद वापस मिला।)

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥१७॥

(आपकी सलाह को विभीषण ने माना, जिसके कारण वे लंका के राजा बने, इस बात को सारा संसार जानता है।)

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥१८॥

(जो सूर्य यहाँ से हजारों योजन की दूरी पर है, उसे आपने एक मीठा फल समझकर निगल लिया था।)

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥१९॥

(भगवान श्रीराम की अंगूठी को मुंह में रखकर आप अथाह समुद्र को लांघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।)

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥

(संसार के जितने भी कठिन से कठिन कार्य हैं, वे आपकी कृपा से अत्यंत आसान हो जाते हैं।)

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आग्या बिनु पैसारे॥२१॥

(आप श्रीराम के दरबार के द्वारपाल हैं। आपकी अनुमति के बिना कोई भी उनके पास प्रवेश नहीं कर सकता।)

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥२२॥

(जो भी आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हैं, तो फिर किसी बात का डर नहीं रहता।)

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥२३॥

(अपने तेज और वेग को केवल आप ही संभाल सकते हैं। आपकी एक हुंकार से तीनों लोक कांप उठते हैं।)

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥२४॥

(जहाँ 'महावीर हनुमान' का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत-प्रेत और बुरी आत्माएं पास भी नहीं फटक सकतीं।)

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥

(वीर हनुमान जी के नाम का निरंतर जाप करने से सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।)

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥

(जो व्यक्ति मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान लगाता है, उसे वे सभी संकटों से मुक्ति दिलाते हैं।)

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥

(तपस्वी राजा श्रीराम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके भी सभी अधूरे व कठिन कार्यों को आपने ही संवारा है।)

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥

(आपके पास कोई भी अपनी इच्छा (मनोरथ) लेकर आता है, उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी कोई सीमा नहीं होती।)

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥

(चारों युगों (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) में आपका प्रताप फैला हुआ है। आपकी कीर्ति से सारा संसार आलोकित है।)

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥

(आप सज्जनों और संतों की रक्षा करने वाले, दुष्टों का नाश करने वाले और श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं।)

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

(आपको माता सीता से ऐसा वरदान मिला है जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ 
दे सकते हैं।)

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥

(आपके पास श्रीराम के नाम की औषधि (रसायन) है। आप हमेशा श्री रघुनाथ जी के परम सेवक बने रहते हैं।)

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥

(आपका भजन करने से लोग श्रीराम को प्राप्त करते हैं और अपने जन्म-जन्मांतर के दुखों को भूल जाते हैं।)

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥३४॥

(अंत समय में वह मृत्यु के बाद श्रीराम के धाम (वैकुंठ) जाता है, और यदि फिर जन्म ले तो हरि-भक्त कहलाता है।)

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥३५॥

(किसी अन्य देवी-देवता की पूजा न करके भी, केवल हनुमान जी की सेवा करने से सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं।)

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥

(जो भी शक्तिशाली हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और सभी दर्द मिट जाते हैं।)

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥३७॥

(हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर एक कृपालु गुरु की तरह कृपा बनाए रखें।)

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥

(जो कोई भी इस चालीसा का सौ बार पाठ करेगा, वह सभी बंधनों (कष्टों) से मुक्त हो जाएगा और उसे परम आनंद मिलेगा।)

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥

(जो भी इस हनुमान चालीसा को पढ़ता है, उसके सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं—इसके साक्षी स्वयं भगवान शिव (गौरीश) हैं।)

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥४०॥

(तुलसीदास हमेशा भगवान के सेवक हैं। हे नाथ! आप सदा के लिए मेरे हृदय में निवास कीजिए।)

दोहा

 पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
 राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

(अर्थ: हे संकटों को दूर करने वाले, कल्याणकारी रूप वाले पवनपुत्र! आप देवताओं के राजा श्रीराम, 
लक्ष्मण और माता सीता के साथ मेरे हृदय में हमेशा निवास करें।)

॥ सियावर रामचंद्र की जय।।

॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥


॥ बोलो भाई सब संतन की जय ॥

हनुमान चालीसा के पाठ के अतिरिक्त आप  हनुमान जी से सम्बंधित इन articles को भी 
जरूर पढ़े।




हनुमान चालीसा का महत्व

हनुमान चालीसा Hanuman Chalisa एक प्रसिद्ध भक्तिपूर्ण स्तुति है, जिसकी रचना Goswami Tulsidas ने की थी। इसमें भगवान Hanuman के गुणों, बल, बुद्धि, भक्ति और सेवा-भाव का वर्णन है। श्रद्धा के साथ इसका पाठ करने 
का उद्देश्य मन को ईश्वर से जोड़ना, साहस बढ़ाना और भक्ति को मजबूत करना माना जाता है।


हनुमान चालीसा के पारंपरिक रूप से बताए जाने वाले लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नियमित पाठ से:

  • मन को शांति और सकारात्मकता मिलती है।
  • भय और नकारात्मक विचारों में कमी महसूस हो सकती है।
  • आत्मविश्वास, धैर्य और साहस बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।
  • भगवान राम और हनुमान जी की भक्ति दृढ़ होती है।
  • कठिन परिस्थितियों में मानसिक संबल प्राप्त होता है

ध्यान रहे कि ये लाभ धार्मिक आस्था पर आधारित हैं। यदि किसी को मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो, तो उचित चिकित्सकीय सलाह भी आवश्यक है।

क्या महिलाएँ हनुमान चालीसा का पाठ कर सकती हैं?

हिन्दू धर्म में ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है जो महिलाओं को हनुमान चालीसा पढ़ने से रोकता हो। महिलाएँ भी श्रद्धा और सम्मान के साथ इसका पाठ कर सकती हैं। अलग-अलग परिवारों या परंपराओं में कुछ स्थानीय 
रीति-रिवाज हो सकते हैं, लेकिन सामान्य रूप से पाठ करना स्वीकार्य माना जाता है।

हनुमान चालीसा पढ़ने के सामान्य नियम

  • स्नान करके या यथासंभव स्वच्छ होकर पाठ करें।
  • शांत स्थान पर बैठकर मन को एकाग्र करें।
  • भगवान हनुमान या श्रीराम का स्मरण करके पाठ आरंभ करें।
  • पाठ के दौरान श्रद्धा और एकाग्रता रखें।
  • यदि संभव हो तो दीपक या अगरबत्ती जला सकते हैं, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।
  • नियमितता, संख्या से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है

किसी परेशानी में कितने दिन पाठ करना चाहिए?

इसका कोई निश्चित धार्मिक नियम नहीं है। लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार:

  • 11 दिन
  • 21 दिन
  • 40 दिन
  • या प्रतिदिन 


हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। कई लोग प्रतिदिन 1, 7 या 11 बार भी पढ़ते हैं। यह व्यक्तिगत संकल्प और आस्था का विषय है।

मंगलवार और शनिवार को ही क्यों?

धार्मिक परंपरा के अनुसार:

मंगलवार को हनुमान जी का विशेष दिन माना जाता है।

शनिवार को भी हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। एक लोकप्रिय मान्यता है कि हनुमान जी की उपासना से शनि देव के कष्टों में राहत मिलती है, इसलिए शनिवार को भी लोग विशेष रूप से पूजा और चालीसा का पाठ करते हैं।

हालाँकि, हनुमान चालीसा किसी भी दिन पढ़ी जा सकती है। मंगलवार और शनिवार केवल विशेष महत्व वाले दिन माने जाते हैं, अनिवार्य नहीं।

यदि आपका उद्देश्य किसी विशेष संकट से मुक्ति, मानसिक शांति, या आध्यात्मिक साधना है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात आप श्रद्धा, नियमितता और सदाचार के साथ पाठ करें।

हनुमान चालीसा का मुख्य उद्देश्य केवल स्तुति करना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को एक आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है। इसमें भगवान Hanuman के गुणों के माध्यम से बताया गया है कि शक्ति, ज्ञान और सफलता का सही उपयोग कैसा होना चाहिए।

1. भक्ति का संदेश

हनुमान जी के जीवन का सबसे बड़ा संदेश है कि सच्ची भक्ति निःस्वार्थ होती है। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा; उनका हर कार्य भगवान श्रीराम की सेवा के लिए था। यह हमें सिखाता है कि कर्तव्य और सेवा में ही सच्ची महानता है।

2. विनम्रता का संदेश

हनुमान जी के पास अपार बल, बुद्धि और पराक्रम था, फिर भी उनमें अहंकार नहीं था। वे अपनी सभी सफलताओं का श्रेय भगवान श्रीराम की कृपा को देते हैं। यह हमें सिखाता है कि जितनी बड़ी सफलता मिले, उतना ही विनम्र रहना चाहिए।

3. साहस और आत्मविश्वास

समुद्र पार करना, सीता माता की खोज करना और लंका में कठिन परिस्थितियों का सामना करना—ये सब इस 
बात का प्रतीक हैं कि विश्वास और दृढ़ संकल्प से बड़ी से बड़ी बाधा भी पार की जा सकती है।

4. सेवा का आदर्श

हनुमान जी ने कभी अपने लाभ के लिए कार्य नहीं किया। उनका जीवन दूसरों की सहायता और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित था। यह हमें निःस्वार्थ सेवा का महत्व सिखाता है।

5. मन पर विजय

धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि हनुमान चालीसा का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ मन को एकाग्र करने, भय कम करने और सकारात्मक सोच विकसित करने में सहायक हो सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका उद्देश्य व्यक्ति को ईश्वर-स्मरण और आत्मबल की ओर ले जाना है।

6. आध्यात्मिक महत्व

हनुमान जी को बल, बुद्धि और भक्ति का संगम माना जाता है। इसलिए चालीसा हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:

  • केवल शक्ति पर्याप्त नहीं, उसके साथ विवेक भी चाहिए।
  • केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, उसके साथ विनम्रता भी चाहिए।
  • केवल सफलता पर्याप्त नहीं, उसके साथ सेवा और करुणा भी होनी चाहिए।


7. जीवन के लिए व्यावहारिक संदेश

  • गुरु का सम्मान करें।
  • सत्य और धर्म का साथ दें।
  • कठिन समय में धैर्य रखें।
  • अपनी क्षमता का उपयोग दूसरों के हित में करें।
  • अहंकार से दूर रहें।
  • ईश्वर पर विश्वास रखते हुए अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएँ

सार

हनुमान चालीसा का मूल संदेश है कि भक्ति से मन शुद्ध होता है, विनम्रता से ज्ञान फलता है, साहस से कठिनाइयाँ पार होती हैं, और निःस्वार्थ सेवा से जीवन सार्थक बनता है। इसी कारण लाखों लोग इसे 
केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि जीवन जीने का मार्गदर्शक भी मानते हैं।




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